Friday, November 3, 2017

November 3, 2010 at 2:40pm me Likhi gayi:-

आओ कुछ यूँ दीपावली मनाएं,
खुशहाली के नव दीप जलाएं ,
करे आगमन नए का हम ,
पर बीते को हम भूल न जाएँ ,
जो रूठे हो कभी भी हमसे ,
आओ फिर से उन्हें मनाये ,
एक सीख ले उन दीपक से हम ,
जाते जाते भी जग रोशन कर जाएँ ll

आओ कुछ यूँ दीवाली मनाएं.....
इसी शुभ विचार के साथ सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं...........

कमल वर्मा "तनहा"

Thursday, October 19, 2017

हमने कुछ ऐसी ज़िंदगी देखी है............(written at Pune)

हमने कुछ ऐसी ज़िंदगी देखी है,

आँसुओ मे भी ख़ुशी देखी है,

बहुत से लोगो को सोने चाँदी पे रोना आता है ,

हमने तो सिक्को मे हँसी देखी है,

ये आसमान के लोग भी हमारे ही बीच के है,

आसमान छूने से पहले इनने भी जमी देखी है,

वक़्त को भूल के ख़ुद पे यक़ीन करो,

वक़्त हाथो हमने ज़िंदगी ठगी देखी है,

अमीरो के शौक ही जलाते है ग़रीबो के चूल्हे ,

इसी यक़ीन मे चौराहे पे एक औरत खड़ी देखी है,

लोगो को ख़ुश करना भले ही पेशा हो उसका ,

रात के अंधेरे मे उसकी आँखो मे नमी देखी है ,

दौलत और शौहरत के इस खेल मे"तन्हा",

ग़रीबी के क़दमो मे अमीरी पड़ी देखी है,

मेरे शहर के लोग........

बरेली शहर में हुआ उसे देखकर अपने आप कुछ लिखा ओ आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ "बरेली शहर" की जुबान में .....


मुझको आज रुला गए मेरे शहर के लोग,

अपनी सूरत असली दिखा गए मेरे शहर के लोग,

जिस भाईचारे की बुनियाद पर अब तक टिका था मैं,

उसकी ईंट से ईंट बजा गए मेरे शहर के लोग ,

दुश्मनों के शोले से जलने में कोई रंज न होता ,

पर मुझको आग लगा गए मेरे शहर के लोग ,

एक जरा सी बात पे क्यों कुफ्र इनको हो गया,

ये गर्म मिज़ाजी कहाँ पा गए मेरे शहर के लोग,

हमने सुना की कल कहीं ईश्वर खुदा से हार गया ,

मज़हब को मज़हब से लड़ा गए मेरे शहर के लोग,

मंदिरों और मस्जिदों ने लपटों को देखा तो कहा,

क्या इस दिन के लिए बना गए मुझे मेरे शहर के लोग ,

अब होली और ईद कुछ सहमी सहमी सी जाएगी,

कुछ ऐसा मंज़र आज बना गए मेरे शहर के लोग,

हासिल तो कुछ हुआ नहीं सिवा अपनों के गवाने का,

आज इंसानियत को खा गए मेरे शहर के लोग,

सुरमे के अलावा अब इन दंगों से जाना जाऊंगा ,

मेरी ऐसी पहचान बना गए मेरे शहर के लोग ,

इस मंज़र की खातिर मै सदियों तक कुरेदा जाऊंगा,

मुझपे एक ऐसा नासूर बना गए मेरे शहर के लोग .


कमल वर्मा "तन्हा"
अक्टूबर 2017 मे झारखंड मे भूंख से हुई एक बच्ची की मौत पर...........



भला कोई एक दिन भूखे रहकर नही मर सकता है........!!!!!!!

जरा सोचो कि वो कितने दिन भूखी रही होगी,
मानवता क्या तुम्हारी आत्मा नही जगी होगी,
इंसानियत तुम उस वक्त कहाँ थी जब बेचारी,
चंद निवालो की खातिर वो तड़प रही होगी,
जमीर तू किस बाजार बिकने चला गया था,
लाचार माँ जब अनाज के लिए यहाँ वहाँ भटकी होगी,

सरकारी गोदामों मे अनाज खराब होना मंजूर है,
मगर जरूरतमंदों को देना सबसे बड़ी गलती होगी,

ऐसे हालात है फिर भी सत्ता मे अहंकार है,
आज आंखों में अश्रुधार है,नैतिकता शर्मशार हैं,
चंद निवालों के अभाव में कहीं कोई मर जाये,
ये क्रषि प्रधान देश की सबसे बड़ी  हार है।
   

कमल गुरुजी