लघु कथा -
आज कार्यालय में आंबेडकर जयंती के उपलक्ष्य में एक गोष्टी का आयोजन किया गया जिसमे कार्यालय के सभी वर्गों के लोगों को बुलाया गया था, वहाँ एक से बढ़कर एक विचारों की प्रस्तुति की गयी सभी ने सामाजिक भेदभाव भूलकर एकजुटता पर ध्यान देने की बात की, लोगों ने किसी भी तरह का भेदभाव न करने की कसम उठाई मुझे इस तरह के आयोजन से लगा की शायद कहीं न कहीं बदलाव हो रहा है और लोग जाती धर्म और भेद भाव से ऊपर उठ कर सामाजिक उत्थान की बातें कर रहे हैं मगर दूसरे ही पल मेरी नज़र जब पास में रखे हुए मिठाई के डब्बों पर गयी जिन्हे कार्यक्रम के बाद वितरित किया जाना था उत्सुकता वश जब भीतर देखा तो पाया की वहां पर तीन तरह के डब्बे रखे थे पहले अधिकारिओं के लिए दूसरा निचले कर्मचारियों के लिए और तीसरा चतुर्थ श्रेणी के लोगों के लिए इतना देखकर मुझे यकीन हो गया की बदलाव की बयार आज भी सिर्फ दिखावों में हैं वास्तविकता में नहीं I
कमल "गुरु जी"
१३/०४/२०१४ (अम्बेडकर जयंती के उपलक्ष्य में )
आज कार्यालय में आंबेडकर जयंती के उपलक्ष्य में एक गोष्टी का आयोजन किया गया जिसमे कार्यालय के सभी वर्गों के लोगों को बुलाया गया था, वहाँ एक से बढ़कर एक विचारों की प्रस्तुति की गयी सभी ने सामाजिक भेदभाव भूलकर एकजुटता पर ध्यान देने की बात की, लोगों ने किसी भी तरह का भेदभाव न करने की कसम उठाई मुझे इस तरह के आयोजन से लगा की शायद कहीं न कहीं बदलाव हो रहा है और लोग जाती धर्म और भेद भाव से ऊपर उठ कर सामाजिक उत्थान की बातें कर रहे हैं मगर दूसरे ही पल मेरी नज़र जब पास में रखे हुए मिठाई के डब्बों पर गयी जिन्हे कार्यक्रम के बाद वितरित किया जाना था उत्सुकता वश जब भीतर देखा तो पाया की वहां पर तीन तरह के डब्बे रखे थे पहले अधिकारिओं के लिए दूसरा निचले कर्मचारियों के लिए और तीसरा चतुर्थ श्रेणी के लोगों के लिए इतना देखकर मुझे यकीन हो गया की बदलाव की बयार आज भी सिर्फ दिखावों में हैं वास्तविकता में नहीं I
कमल "गुरु जी"
१३/०४/२०१४ (अम्बेडकर जयंती के उपलक्ष्य में )