पिछले 2-3 दिनों से पूरी दिल्ली सभी अख़बार,सभी समाचार चैनल और सभी सोशल साईट पर छाई हुई है और जिस कारण से ये सुर्ख़ियों में है ऐसा नहीं है की राजधानी में ये पहली बार हुआ है 2003 में बुद्धा जयंती पार्क , 2005 में धौला कुआँ का केस और ज्यादा दूर नहीं ये अभी साल की शुरुवात में गुवाहाटी का केस और न जाने किंटने केस जो शयद इन अखबार की सुर्ख़ियों में न आने के कारन कभी सामने आये ही नहीं मगर कभी किसी ने ये जानने की कोशश की की आखिर उनमे लिप्त अपराधियों के साथ क्या हुआ उन्हें सजा मिली की नहीं........
अजी इन सब के बारे में हम क्यों सोंचे हम तो बस दो चार दिन के लिए मोमबती जलायेंगे , शांति मार्च निकालेंगे और ज्यादा हुआ तो सरकार को गली देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर देंगे और फिर एक अगली सनसनी के लिए मोमबत्तियां जुटा कर रख लेंगे और इधर ये मीडिया वाले जो आरुशि हत्याकांड को 2-3 महीने में एक बार जरुर ले आते हैं मगर इस तरह के अपराधों के बारे में एक हफ्ते के बाद शायद कोई ज़िक्र भी नहीं करते हैं l
आज हर जगह इस केस को गंभीरता से लेते हुए कड़े कानून बनाने की बात की जा रही है आखिर उससे क्या होगा ? क्या कड़ा कानून उस पीड़िता को पहले वाली ज़िन्दगी दे सकता है उसे कोई सभ्य (आज कल बस कहने को )अपने परिवार का हिस्सा बना सकता है नहीं न / कितनी अजीब बात है न जो समाज आज उस पीडिता के लिए पुरे देश में दुआएं कर रहा है उसे इस अंजाम तक लाने वाला भी इसी समाज का एक हिस्सा है और कुछ दिनों बाद वही अपराधी इस समाज के एक हिस्सा बन जायेगा मगर बेचारी पीडिता उम्र बार अपने अस्तित्व को तलशती रहेगी l
जब तक हमारा समाज इस तरह के अपराधी लोगों को स्वीकारता रहेगा ऐसी घटनाएँ होती रहेंगी और अगर हम सभ्य बनकर यूँ ही चुप रहे और सोते रहे (2-3 दिन शोर करने का मतलब ये नहीं होता की हम जाग गए हैं ) तो शायद आगे इससे भी जयादा और गंभीर अपराध देखने को मिलेंगे ये बस शुरुवात मात्र है l