Friday, December 30, 2011

मैं कौन हूँ?


देश में हो रही राजनैतिक उथल पुथल से परेशान होकर एक रोज़ जब मैं बाहर पार्क में बैठा था तभी देखा की एक ६३ साल का बुजुर्ग अपने आप में कुछ बडबडा रहा है मगर जब ध्यान से उसकी बडबड़ाहट सुनी तो समझ में आया की वो बुजुर्ग कोई और नहीं बल्कि मेरा प्यारा  "भारत देश" ही है जो इस उथल पुथल से परेशान होकर गाहे बगाहे जनता के बीच आकर अपनी व्यथा कहता रहता है .....उन्हें ही मैंने अपने शब्दों में ढालने का प्रयास किया है शायद आप सुधि लोगों को उस बुजुर्ग की बाते समझ आये और आप उसे जवाब दे पायें ..........    

कभी कभी सोंचता हूँ की मैं कौन हूँ?
इतना शर्मसार होते हुए भी मैं मौन हूंl
कुछ मेरा  नाम लेकर मुझ पर कुर्बान हो जाते हैं,
और कुछ मेरा ही नाम लेकर बेईमान हो जाते हैं l
जहाँ राम को रहीम से लड़ाया जाता हो,
जहाँ सिख को गैर हिंदू बताया जाता हो l
जहाँ राजनीती के लिए धर्म को लड़ाया जाता हो,
फिर भी धर्म निरपेक्षता का ढोंग दिखाया जाता हो l
किसान खुद ही जहां एक वक़्त की रोटी को तरसता हो,
हालातों से निराश होकर बेचारा फंदे से लटकता हो l
जहां राजनीती सेवा नहीं व्यवसाय बन जाती है,
विकास निधि जहाँ भ्रष्ट सेवकों की आय बन जाती है l
जहां न्याय खुद ही अपना वजूद खोजता हो,
कानून जहाँ खुद को पैसों से तोलता हो  l
जहाँ "नेता" शब्द जयचंदों का पर्याय बन गया हो,
जनता होना मनुष्यता से अन्याय बन गया हो l
जहां आज भी कुरुवंश से हर रोज़ होता एक संघर्ष है,
कान्हा तुम्ही बताओ क्या यह वही "भारत वर्ष" है  ll 

द्वारा- कमल वर्मा "तनहा"
११:४१ -३०/१२/२०११ 

Friday, December 23, 2011

हमारे माननीय नेताओं से एक सवाल ..........

हमारे माननीय नेताओं से एक सवाल ..........

मेरा सवाल संजय निरुपम और इनके जैसे उन सभी नेताओं से है जिन्हें देश की बजाय संसद की गरिमा की ज्यादा फ़िक्र है 
कल संजय निरुपम (जो मुंबई में उत्तर भारतियों के द्वारा चुने गए एकमात्र उत्तर भारतीय नेता हैं और साथ ही साथ दल बदलू भी ) की बहस सुन रहा था संजय निरुपम वहीँ हैं जिन्हें लोगों ने बड़ी आस के साथ चुना था और लोगों की उम्मीदों पर वो कितना खरे उतरे ये हम सभी लोग अच्छी तरह से जानते हैं जो उत्तर भारतीओं को ठाकरे बंधुओ से बचाने के बजाय आज कल राहुल गाँधी को लोगो (जनता) के कटाक्ष से बचाने में लगे हुए है  बहस में कई बार उन्होंने अन्ना के आचरण को संसद का अपमान बताया मगर मैं ये नहीं समझ पाता हूँ की उसी संसद में जब ये अनपढ़, जाहिल और बिन बुद्धि के लोग असंसदीय भाषा का इस्तेमाल करते हैं, लोकसभा/राज्यसभा अध्यक्ष पर कागज फेके जाते हैं , अच्छा खासा हाल जब कुश्ती का एक अखाड़ा बन जाता है, लालू जैसे लोग अपनी मसखरेपन से वहां के लोगों का मनोरंजन करते हैं , बीच बहस में नोटों के बण्डल दिखाए जाते हैं तब उस गरिमा का ख्याल कहाँ चला जाता है .........
क्या आप जैसे मुट्ठी भर नेताओं ने ही इस संसद की गरिमा के मापदंड बनाने का ठेका ले रखा है हम जनता की कोई अहमियत नहीं है जिसने इन जैसे लोगों को वहां जाने लायक बनाया है और ये बात कतई मत भूलना की अन्दर तुम जैसे नमकहरामो और गद्दार नेताओं को बचाने के लिए बहार जनता के बेटों ने ही अपने सीने पर गोलियां खायी थी .......