देश में हो रही राजनैतिक उथल पुथल से परेशान होकर एक रोज़ जब मैं बाहर पार्क में बैठा था तभी देखा की एक ६३ साल का बुजुर्ग अपने आप में कुछ बडबडा रहा है मगर जब ध्यान से उसकी बडबड़ाहट सुनी तो समझ में आया की वो बुजुर्ग कोई और नहीं बल्कि मेरा प्यारा "भारत देश" ही है जो इस उथल पुथल से परेशान होकर गाहे बगाहे जनता के बीच आकर अपनी व्यथा कहता रहता है .....उन्हें ही मैंने अपने शब्दों में ढालने का प्रयास किया है शायद आप सुधि लोगों को उस बुजुर्ग की बाते समझ आये और आप उसे जवाब दे पायें ..........
कभी कभी सोंचता हूँ की मैं कौन हूँ?
इतना शर्मसार होते हुए भी मैं मौन हूंl
कुछ मेरा नाम लेकर मुझ पर कुर्बान हो जाते हैं,
और कुछ मेरा ही नाम लेकर बेईमान हो जाते हैं l
जहाँ राम को रहीम से लड़ाया जाता हो,
जहाँ सिख को गैर हिंदू बताया जाता हो l
जहाँ राजनीती के लिए धर्म को लड़ाया जाता हो,
फिर भी धर्म निरपेक्षता का ढोंग दिखाया जाता हो l
किसान खुद ही जहां एक वक़्त की रोटी को तरसता हो,
हालातों से निराश होकर बेचारा फंदे से लटकता हो l
जहां राजनीती सेवा नहीं व्यवसाय बन जाती है,
विकास निधि जहाँ भ्रष्ट सेवकों की आय बन जाती है l
जहां न्याय खुद ही अपना वजूद खोजता हो,
कानून जहाँ खुद को पैसों से तोलता हो l
जहाँ "नेता" शब्द जयचंदों का पर्याय बन गया हो,
जनता होना मनुष्यता से अन्याय बन गया हो l
जहां आज भी कुरुवंश से हर रोज़ होता एक संघर्ष है,
कान्हा तुम्ही बताओ क्या यह वही "भारत वर्ष" है ll
द्वारा- कमल वर्मा "तनहा"
११:४१ -३०/१२/२०११