Wednesday, May 26, 2010

एक तेरी जिद्द एक मेरा हुनर ......

तुझसे जुदा रहकर मैं जीने को मजबूर था,
क्या करता मेरे घर से दरिया बहुत दूर था,
जाने क्या क्या कहते रहे लोग तेरे बारे मे,
और मैं था की तेरे अच्छाइयों का मशकूर था,
जब भी पूंछते थे लोग तेरे बारें मे मुझसे ,
हंसकर उनकी बात मैं टालता जरूर था,
उसकी बेवफाई का जवाब मैं देता कैसे उसे,
ज़माने मे मैं बस वफ़ा के लिए ही मशहूर था,
सुनले मुझको यूँ "तन्हा" छोड़कर जाने वाले,
मुझमे भी अब अकेले जीने का शऊर था !

Kamal Verma"तन्हा"

1 comment:

Rohit Saxena said...

Kamaal hai dost... :)