Wednesday, May 26, 2010

बचपन की यादें...........

गुज़रे वक़्त के झरोखे से कुछ यादें बाहर आई थी,
अंतर्मन पे बदली बनकर कुछ ऐसी ओ छायी थी,
कुछ यादें सच्ची थी और कुछ सिर्फ छलावा थी,
कुछ थी निज अपनी और कुछ सिर्फ एक दिखावा थी,
इनमे से एक मीठी याद उसकी भी थी,
जिसके लिए अब तक की ज़िन्दगी जी थी
मगर आज वो हकीकत से परे सिर्फ एक याद है,
आज भी खुदा से मेरी पहली और आखिरी फरियाद है,
उनमे से एक याद एक चंचल सपने सी थी,
क्यों ना हो वो मेरे बचपने की थी,
जो पुराने आम के बगीचे बेर के पेड़ों को अब तक सहेजे थी,
बाबा की चौपाल, दादी नानी की कहानी भी समेटी थी,
वो झूठ मूठ का रोना वो टुटा हुआ खिलौना,
वो दादी की झप्पी वो बाबा का बिछौना,
वो अम्मा की फटकार वो पापा का प्यार,
गुड्डे गुडियों के खेल मे आपसी तकरार,
वो दशहरे के मेले मे जाना,
पापा के हाथों मे ऊँगली थमाना,
वो जादू के तमाशे वो जोकर के खेल,
वो चकरघिन्नी का झूला वो ठेले की भेल,
वो हनुमान जी की पूछ से झूठी लंका का जलना,
ओ कंधे पे बैठकर जलते रावण को तकना,
वो खिलौने वाली बन्दूक के लिए जिद करना,
फिर पूरे मोहल्ले मे उसे लेकर निकलना,
इन यादों की बदली फिर से छा गयी,
एक अरसे के बाद आज फिर रुला गयी,
क्यों की आज बहुत कुछ बदला थोडा कुछ वही है,
हम है वो है बस दादी नानी नहीं है,
दादा के बिछौने पर हम आज भी सोते है,
लेकिन दादा के लिए हम अक्सर रोते है,
वो बेर के पेड़ और बगीचे कट गए है,
हमारे खेलने के ठिकाने प्लाट मे बट गए है,
अब मेलों मे भी उतनी उमंग नहीं आती,
क्यों की अब वहां भी वो बचपन संग नहीं आती,
अब कोई गुड्डे गुडियों के खेल नहीं रचता है,
हर किसी को टी वी वीडियो गेम ही भाता है,
सच मे आज बदलाव हो रहा है,
लेकिन इस बदलाव मे कहीं बचपन खो रहा है,
डर है कहीं ये बदलाव बचपन को न ख़तम कर दे,
और आने वाली पढ़ी सीधे जवानी मे क़दम रखे
और आने वाली पढ़ी सीधे जवानी मे क़दम रखे..........

कमल"तन्हा"

1 comment:

Rohit Saxena said...

dost 21 saal ho chuke hain ghar chhode huye....21 saal pehale ka samay yaad dila gayi yeh panktiyaan....