बरेली शहर में हुआ उसे देखकर अपने आप कुछ लिखा ओ आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ "बरेली शहर" की जुबान में .....
मुझको आज रुला गए मेरे शहर के लोग,
अपनी सूरत असली दिखा गए मेरे शहर के लोग,
जिस भाईचारे की बुनियाद पर अब तक टिका था मैं,
उसकी ईंट से ईंट बजा गए मेरे शहर के लोग ,
दुश्मनों के शोले से जलने में कोई रंज न होता ,
पर मुझको आग लगा गए मेरे शहर के लोग ,
एक जरा सी बात पे क्यों कुफ्र इनको हो गया,
ये गर्म मिज़ाजी कहाँ पा गए मेरे शहर के लोग,
हमने सुना की कल कहीं ईश्वर खुदा से हार गया ,
मज़हब को मज़हब से लड़ा गए मेरे शहर के लोग,
मंदिरों और मस्जिदों ने लपटों को देखा तो कहा,
क्या इस दिन के लिए बना गए मुझे मेरे शहर के लोग ,
अब होली और ईद कुछ सहमी सहमी सी जाएगी,
कुछ ऐसा मंज़र आज बना गए मेरे शहर के लोग,
हासिल तो कुछ हुआ नहीं सिवा अपनों के गवाने का,
आज इंसानियत को खा गए मेरे शहर के लोग,
सुरमे के अलावा अब इन दंगों से जाना जाऊंगा ,
मेरी ऐसी पहचान बना गए मेरे शहर के लोग ,
इस मंज़र की खातिर मै सदियों तक कुरेदा जाऊंगा,
मुझपे एक ऐसा नासूर बना गए मेरे शहर के लोग .
कमल वर्मा "तन्हा"
Wednesday, May 26, 2010
बचपन की यादें...........
गुज़रे वक़्त के झरोखे से कुछ यादें बाहर आई थी,
अंतर्मन पे बदली बनकर कुछ ऐसी ओ छायी थी,
कुछ यादें सच्ची थी और कुछ सिर्फ छलावा थी,
कुछ थी निज अपनी और कुछ सिर्फ एक दिखावा थी,
इनमे से एक मीठी याद उसकी भी थी,
जिसके लिए अब तक की ज़िन्दगी जी थी
मगर आज वो हकीकत से परे सिर्फ एक याद है,
आज भी खुदा से मेरी पहली और आखिरी फरियाद है,
उनमे से एक याद एक चंचल सपने सी थी,
क्यों ना हो वो मेरे बचपने की थी,
जो पुराने आम के बगीचे बेर के पेड़ों को अब तक सहेजे थी,
बाबा की चौपाल, दादी नानी की कहानी भी समेटी थी,
वो झूठ मूठ का रोना वो टुटा हुआ खिलौना,
वो दादी की झप्पी वो बाबा का बिछौना,
वो अम्मा की फटकार वो पापा का प्यार,
गुड्डे गुडियों के खेल मे आपसी तकरार,
वो दशहरे के मेले मे जाना,
पापा के हाथों मे ऊँगली थमाना,
वो जादू के तमाशे वो जोकर के खेल,
वो चकरघिन्नी का झूला वो ठेले की भेल,
वो हनुमान जी की पूछ से झूठी लंका का जलना,
ओ कंधे पे बैठकर जलते रावण को तकना,
वो खिलौने वाली बन्दूक के लिए जिद करना,
फिर पूरे मोहल्ले मे उसे लेकर निकलना,
इन यादों की बदली फिर से छा गयी,
एक अरसे के बाद आज फिर रुला गयी,
क्यों की आज बहुत कुछ बदला थोडा कुछ वही है,
हम है वो है बस दादी नानी नहीं है,
दादा के बिछौने पर हम आज भी सोते है,
लेकिन दादा के लिए हम अक्सर रोते है,
वो बेर के पेड़ और बगीचे कट गए है,
हमारे खेलने के ठिकाने प्लाट मे बट गए है,
अब मेलों मे भी उतनी उमंग नहीं आती,
क्यों की अब वहां भी वो बचपन संग नहीं आती,
अब कोई गुड्डे गुडियों के खेल नहीं रचता है,
हर किसी को टी वी वीडियो गेम ही भाता है,
सच मे आज बदलाव हो रहा है,
लेकिन इस बदलाव मे कहीं बचपन खो रहा है,
डर है कहीं ये बदलाव बचपन को न ख़तम कर दे,
और आने वाली पढ़ी सीधे जवानी मे क़दम रखे
और आने वाली पढ़ी सीधे जवानी मे क़दम रखे..........
कमल"तन्हा"
अंतर्मन पे बदली बनकर कुछ ऐसी ओ छायी थी,
कुछ यादें सच्ची थी और कुछ सिर्फ छलावा थी,
कुछ थी निज अपनी और कुछ सिर्फ एक दिखावा थी,
इनमे से एक मीठी याद उसकी भी थी,
जिसके लिए अब तक की ज़िन्दगी जी थी
मगर आज वो हकीकत से परे सिर्फ एक याद है,
आज भी खुदा से मेरी पहली और आखिरी फरियाद है,
उनमे से एक याद एक चंचल सपने सी थी,
क्यों ना हो वो मेरे बचपने की थी,
जो पुराने आम के बगीचे बेर के पेड़ों को अब तक सहेजे थी,
बाबा की चौपाल, दादी नानी की कहानी भी समेटी थी,
वो झूठ मूठ का रोना वो टुटा हुआ खिलौना,
वो दादी की झप्पी वो बाबा का बिछौना,
वो अम्मा की फटकार वो पापा का प्यार,
गुड्डे गुडियों के खेल मे आपसी तकरार,
वो दशहरे के मेले मे जाना,
पापा के हाथों मे ऊँगली थमाना,
वो जादू के तमाशे वो जोकर के खेल,
वो चकरघिन्नी का झूला वो ठेले की भेल,
वो हनुमान जी की पूछ से झूठी लंका का जलना,
ओ कंधे पे बैठकर जलते रावण को तकना,
वो खिलौने वाली बन्दूक के लिए जिद करना,
फिर पूरे मोहल्ले मे उसे लेकर निकलना,
इन यादों की बदली फिर से छा गयी,
एक अरसे के बाद आज फिर रुला गयी,
क्यों की आज बहुत कुछ बदला थोडा कुछ वही है,
हम है वो है बस दादी नानी नहीं है,
दादा के बिछौने पर हम आज भी सोते है,
लेकिन दादा के लिए हम अक्सर रोते है,
वो बेर के पेड़ और बगीचे कट गए है,
हमारे खेलने के ठिकाने प्लाट मे बट गए है,
अब मेलों मे भी उतनी उमंग नहीं आती,
क्यों की अब वहां भी वो बचपन संग नहीं आती,
अब कोई गुड्डे गुडियों के खेल नहीं रचता है,
हर किसी को टी वी वीडियो गेम ही भाता है,
सच मे आज बदलाव हो रहा है,
लेकिन इस बदलाव मे कहीं बचपन खो रहा है,
डर है कहीं ये बदलाव बचपन को न ख़तम कर दे,
और आने वाली पढ़ी सीधे जवानी मे क़दम रखे
और आने वाली पढ़ी सीधे जवानी मे क़दम रखे..........
कमल"तन्हा"
एक तेरी जिद्द एक मेरा हुनर ......
तुझसे जुदा रहकर मैं जीने को मजबूर था,
क्या करता मेरे घर से दरिया बहुत दूर था,
जाने क्या क्या कहते रहे लोग तेरे बारे मे,
और मैं था की तेरे अच्छाइयों का मशकूर था,
जब भी पूंछते थे लोग तेरे बारें मे मुझसे ,
हंसकर उनकी बात मैं टालता जरूर था,
उसकी बेवफाई का जवाब मैं देता कैसे उसे,
ज़माने मे मैं बस वफ़ा के लिए ही मशहूर था,
सुनले मुझको यूँ "तन्हा" छोड़कर जाने वाले,
मुझमे भी अब अकेले जीने का शऊर था !
Kamal Verma"तन्हा"
क्या करता मेरे घर से दरिया बहुत दूर था,
जाने क्या क्या कहते रहे लोग तेरे बारे मे,
और मैं था की तेरे अच्छाइयों का मशकूर था,
जब भी पूंछते थे लोग तेरे बारें मे मुझसे ,
हंसकर उनकी बात मैं टालता जरूर था,
उसकी बेवफाई का जवाब मैं देता कैसे उसे,
ज़माने मे मैं बस वफ़ा के लिए ही मशहूर था,
सुनले मुझको यूँ "तन्हा" छोड़कर जाने वाले,
मुझमे भी अब अकेले जीने का शऊर था !
Kamal Verma"तन्हा"
मेरी हालत पे तरस खाने के बाद .......
मेरी हालत पे तरस खाने के बाद ,
रो पड़े थे सभी मुस्कुराने के बाद ,
क्या करूं इस दिले नामुराद का ,
याद करता है उनको उनके जाने के बाद ,
होश की बातें अभी मत करो साहब ,
होश मे आऊंगा मैं इस पैमाने के बाद ,
देख कर तुम जिसे सजते सवरते हो ,
याद आएगा ओ आइना टूट जाने के बाद ,
हाथों की लकीरों पे ऐतबार दिला के ,
कोई लूट गया मुझको दिल लगाने के बाद ,
जा रहा हूँ इस ऐतबार पे दुनिया से ,
याद न आना मुझको भूल जाने के बाद !
कमल "तन्हा"
रो पड़े थे सभी मुस्कुराने के बाद ,
क्या करूं इस दिले नामुराद का ,
याद करता है उनको उनके जाने के बाद ,
होश की बातें अभी मत करो साहब ,
होश मे आऊंगा मैं इस पैमाने के बाद ,
देख कर तुम जिसे सजते सवरते हो ,
याद आएगा ओ आइना टूट जाने के बाद ,
हाथों की लकीरों पे ऐतबार दिला के ,
कोई लूट गया मुझको दिल लगाने के बाद ,
जा रहा हूँ इस ऐतबार पे दुनिया से ,
याद न आना मुझको भूल जाने के बाद !
कमल "तन्हा"
हमने कुछ ऐसी ज़िंदगी देखी है............(written at Pune)
हमने कुछ ऐसी ज़िंदगी देखी है,
आँसुओ मे भी ख़ुशी देखी है,
बहुत से लोगो को सोने चाँदी पे रोना आता है ,
हमने तो सिक्को मे हँसी देखी है,
ये आसमान के लोग भी हमारे ही बीच के है,
आसमान छूने से पहले इनने भी जमी देखी है,
वक़्त को भूल के ख़ुद पे यक़ीन करो,
वक़्त हाथो हमने ज़िंदगी ठगी देखी है,
अमीरो के शौक ही जलाते है ग़रीबो के चूल्हे ,
इसी यक़ीन मे चौराहे पे एक औरत खड़ी देखी है,
लोगो को ख़ुश करना भले ही पेशा हो उसका ,
रात के अंधेरे मे उसकी आँखो मे नमी देखी है ,
दौलत और शौहरत के इस खेल मे"तन्हा",
ग़रीबी के क़दमो मे अमीरी पड़ी देखी है,
आँसुओ मे भी ख़ुशी देखी है,
बहुत से लोगो को सोने चाँदी पे रोना आता है ,
हमने तो सिक्को मे हँसी देखी है,
ये आसमान के लोग भी हमारे ही बीच के है,
आसमान छूने से पहले इनने भी जमी देखी है,
वक़्त को भूल के ख़ुद पे यक़ीन करो,
वक़्त हाथो हमने ज़िंदगी ठगी देखी है,
अमीरो के शौक ही जलाते है ग़रीबो के चूल्हे ,
इसी यक़ीन मे चौराहे पे एक औरत खड़ी देखी है,
लोगो को ख़ुश करना भले ही पेशा हो उसका ,
रात के अंधेरे मे उसकी आँखो मे नमी देखी है ,
दौलत और शौहरत के इस खेल मे"तन्हा",
ग़रीबी के क़दमो मे अमीरी पड़ी देखी है,
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