Thursday, September 30, 2010

ना मंदिर की चाह ना मस्जिद की ज़रूरत ............


अयोध्या में विवादित स्थल  को लेकर की जा रही राजनीति पर .......


न हिन्दू होता है न मुसलमान होता है,
मरने वाला तो सिर्फ एक इंसान होता है,
एक ज़रा सी बात क्यों नहीं समझ आती,
सुना था आदमी बहुत  बुद्धिमान होता है ,
बिखरे हुए रिश्तों को जरा समेटकर तो देखो,
इसकी नीव पर खड़ा कैसा हिन्दुस्तान होता है,
उसको न मंदिर की चाह न मस्जिद की ज़रूरत,
हमारा दिल ही उस खुदा का असल मकान होता है ,
बचपन से पढ़ते आये हम राम रहीम की नसीहतें ,
पर आज तलक नहीं जाना क्या भगवान् होता है ,
ये किसने बाट दिया इसको तमाम कौमों में ,
खुदा की नज़र में जो सिर्फ एक इंसान होता है ,
हमारी सोंच  ही बनती है ये  मंदिर और मस्जिद ,
जबकि दोनों में वही ईट, पत्थर वही सामान होता है,
मुल्क की खातिर भी  कभी हथियार उठाओ,
मज़हब की खातिर मरना बहुत आसान होता है 
आओ कसम ले और फिर से कायम करें अमन,
 इंसानियत से बढाकर भी क्या कोई भगवान् होता हैll

Kamal Verma
12:06 ,30/09/2010  

Monday, August 9, 2010

त्रिवेणी


तुझमें  बिखेरने  का हुनर है,
मुझमें  सवंरने का हुनर है ,
तुझसे हारने की खातिर मै आज तलक बिखरा हूँ 

कमल "तनहा"
०१:१७ a.m., ०९/०८/२०१० 

त्रिवेणी


आओ बदल लें  एक दूसरे की यादों को,
आओ बदल लें एक दूसरे के ख्वाबों को,
फिर बताना कौन किसको कितना सताता है I

कमल "तनहा"
०१:०९ a.m. , ०९/०८/२०१०

त्रिवेणी

ज़िन्दगी से मुझे कोई शिकवा न होगा,
मौत से  भी मेरा कोई  गिला न होगा ,
सिर्फ तेरे रूठने और मानने भर का फासला है दोनों में I 

कमल "तनहा"
०१:०२ a.m., ०९/०८/२०१० 

त्रिवेणी

ख़त बनकर तेरे हाथों में मचलना है मुझे,
मज़मून बनकर तेरे लबों को छुना हैं मुझे,
बस पहुँच जाऊं सलामती से एक बार तेरे दिल के पते पर I

कमल "तनहा" 
१२:५३ a.m., ०९/०८/२०१०   

Monday, August 2, 2010

"ज़िन्दगी"

किसी के लिए खुली किताब है ज़िन्दगी,
किसी के लिए यूँ ही लाजवाब है ज़िन्दगी,
हर किसी की आँखों से आंसुओं को चुरा सके 
हमारे लिए तो ऐसा ही ख्वाब है ज़िन्दगी,
हर एक सांस का जवाब है ज़िन्दगी,
दिल की धडकनों की मंद आवाज़ है ज़िन्दगी,
ज़रा संभल के खर्च करना ये साँसे ये धड़कने,
"तन्हा" हर सांस हर धड़कन का हिसाब है ज़िन्दगी I

कमल वर्मा"तन्हा"
एक ज़रा सी बात पे उम्र भर को रूठने वाले,
तेरे बिना तो ये ज़िन्दगी भी सजा होती है, 
अब तो आ जा के अब "तन्हा" रहा नहीं जाता,
आखिर यूँ रूठने की भी कोई इन्तहा होती है l






Kamal - on 24/10/2009 at 11:30 am

Wednesday, July 14, 2010

"त्रिवेणी"

एक लकीर थी ख्वाबों के  बुनने की ,
एक लकीर थी आसमान को छूने की,

मगर आज भी ज़िन्दगी की लकीर की जगह तुम्हारा नाम है हथेली पर मेरी . 



Monday, June 14, 2010

"त्रिवेणी"

  जब मैं तनहा होता हूँ,
ना जाने कहाँ कहाँ होता हूँ,

सुना है कल तेरी पलकों की देहलीज तक आ गया था.....
  01:00 am 14/06/2010

Wednesday, June 9, 2010

"त्रिवेणी"

आओ बैठो फिर झगड़ लेंगे कभी,
आज कुछ नयी सी  बात करते है ,

वैसे भी एक ही बात पे लड़ते हुए बहुत वक़्त हो गया है I

12:31 am 09/06/2010

"त्रिवेणी"

अब मुनासिब नहीं है की कुछ लिखा जाये,
तेरी तारीफ में मेरे अल्फाजों को परखा जाये,

क्यों की एक दूजे पे तोहमत लगायेंगे एक दूजे के चाहने वाले .....

12:10 am, 06/09/10

Friday, June 4, 2010

"त्रिवेणी"

तुझसे मिलना, चंद खवाबों का सजोना,
तुझसे बिछड़ना, उम्र भर का रोना ,
*
*
*
इस चार दिन की ज़िन्दगी की चार बातें ही याद है..

Wednesday, May 26, 2010

मेरे शहर के लोग........

बरेली शहर में हुआ उसे देखकर अपने आप कुछ लिखा ओ आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ "बरेली शहर" की जुबान में .....

मुझको आज रुला गए मेरे शहर के लोग,
अपनी सूरत असली दिखा गए मेरे शहर के लोग,
जिस भाईचारे की बुनियाद पर अब तक टिका था मैं,
उसकी ईंट से ईंट बजा गए मेरे शहर के लोग ,
दुश्मनों के शोले से जलने में कोई रंज न होता ,
पर मुझको आग लगा गए मेरे शहर के लोग ,
एक जरा सी बात पे क्यों कुफ्र इनको हो गया,
ये गर्म मिज़ाजी कहाँ पा गए मेरे शहर के लोग,
हमने सुना की कल कहीं ईश्वर खुदा से हार गया ,
मज़हब को मज़हब से लड़ा गए मेरे शहर के लोग,
मंदिरों और मस्जिदों ने लपटों को देखा तो कहा,
क्या इस दिन के लिए बना गए मुझे मेरे शहर के लोग ,
अब होली और ईद कुछ सहमी सहमी सी जाएगी,
कुछ ऐसा मंज़र आज बना गए मेरे शहर के लोग,
हासिल तो कुछ हुआ नहीं सिवा अपनों के गवाने का,
आज इंसानियत को खा गए मेरे शहर के लोग,
सुरमे के अलावा अब इन दंगों से जाना जाऊंगा ,
मेरी ऐसी पहचान बना गए मेरे शहर के लोग ,
इस मंज़र की खातिर मै सदियों तक कुरेदा जाऊंगा,
मुझपे एक ऐसा नासूर बना गए मेरे शहर के लोग .

कमल वर्मा "तन्हा"

बचपन की यादें...........

गुज़रे वक़्त के झरोखे से कुछ यादें बाहर आई थी,
अंतर्मन पे बदली बनकर कुछ ऐसी ओ छायी थी,
कुछ यादें सच्ची थी और कुछ सिर्फ छलावा थी,
कुछ थी निज अपनी और कुछ सिर्फ एक दिखावा थी,
इनमे से एक मीठी याद उसकी भी थी,
जिसके लिए अब तक की ज़िन्दगी जी थी
मगर आज वो हकीकत से परे सिर्फ एक याद है,
आज भी खुदा से मेरी पहली और आखिरी फरियाद है,
उनमे से एक याद एक चंचल सपने सी थी,
क्यों ना हो वो मेरे बचपने की थी,
जो पुराने आम के बगीचे बेर के पेड़ों को अब तक सहेजे थी,
बाबा की चौपाल, दादी नानी की कहानी भी समेटी थी,
वो झूठ मूठ का रोना वो टुटा हुआ खिलौना,
वो दादी की झप्पी वो बाबा का बिछौना,
वो अम्मा की फटकार वो पापा का प्यार,
गुड्डे गुडियों के खेल मे आपसी तकरार,
वो दशहरे के मेले मे जाना,
पापा के हाथों मे ऊँगली थमाना,
वो जादू के तमाशे वो जोकर के खेल,
वो चकरघिन्नी का झूला वो ठेले की भेल,
वो हनुमान जी की पूछ से झूठी लंका का जलना,
ओ कंधे पे बैठकर जलते रावण को तकना,
वो खिलौने वाली बन्दूक के लिए जिद करना,
फिर पूरे मोहल्ले मे उसे लेकर निकलना,
इन यादों की बदली फिर से छा गयी,
एक अरसे के बाद आज फिर रुला गयी,
क्यों की आज बहुत कुछ बदला थोडा कुछ वही है,
हम है वो है बस दादी नानी नहीं है,
दादा के बिछौने पर हम आज भी सोते है,
लेकिन दादा के लिए हम अक्सर रोते है,
वो बेर के पेड़ और बगीचे कट गए है,
हमारे खेलने के ठिकाने प्लाट मे बट गए है,
अब मेलों मे भी उतनी उमंग नहीं आती,
क्यों की अब वहां भी वो बचपन संग नहीं आती,
अब कोई गुड्डे गुडियों के खेल नहीं रचता है,
हर किसी को टी वी वीडियो गेम ही भाता है,
सच मे आज बदलाव हो रहा है,
लेकिन इस बदलाव मे कहीं बचपन खो रहा है,
डर है कहीं ये बदलाव बचपन को न ख़तम कर दे,
और आने वाली पढ़ी सीधे जवानी मे क़दम रखे
और आने वाली पढ़ी सीधे जवानी मे क़दम रखे..........

कमल"तन्हा"

एक तेरी जिद्द एक मेरा हुनर ......

तुझसे जुदा रहकर मैं जीने को मजबूर था,
क्या करता मेरे घर से दरिया बहुत दूर था,
जाने क्या क्या कहते रहे लोग तेरे बारे मे,
और मैं था की तेरे अच्छाइयों का मशकूर था,
जब भी पूंछते थे लोग तेरे बारें मे मुझसे ,
हंसकर उनकी बात मैं टालता जरूर था,
उसकी बेवफाई का जवाब मैं देता कैसे उसे,
ज़माने मे मैं बस वफ़ा के लिए ही मशहूर था,
सुनले मुझको यूँ "तन्हा" छोड़कर जाने वाले,
मुझमे भी अब अकेले जीने का शऊर था !

Kamal Verma"तन्हा"

मेरी हालत पे तरस खाने के बाद .......

मेरी हालत पे तरस खाने के बाद ,
रो पड़े थे सभी मुस्कुराने के बाद ,
क्या करूं इस दिले नामुराद का ,
याद करता है उनको उनके जाने के बाद ,
होश की बातें अभी मत करो साहब ,
होश मे आऊंगा मैं इस पैमाने के बाद ,
देख कर तुम जिसे सजते सवरते हो ,
याद आएगा ओ आइना टूट जाने के बाद ,
हाथों की लकीरों पे ऐतबार दिला के ,
कोई लूट गया मुझको दिल लगाने के बाद ,
जा रहा हूँ इस ऐतबार पे दुनिया से ,
याद न आना मुझको भूल जाने के बाद !

कमल "तन्हा"

हमने कुछ ऐसी ज़िंदगी देखी है............(written at Pune)

हमने कुछ ऐसी ज़िंदगी देखी है,
आँसुओ मे भी ख़ुशी देखी है,
बहुत से लोगो को सोने चाँदी पे रोना आता है ,
हमने तो सिक्को मे हँसी देखी है,
ये आसमान के लोग भी हमारे ही बीच के है,
आसमान छूने से पहले इनने भी जमी देखी है,
वक़्त को भूल के ख़ुद पे यक़ीन करो,
वक़्त हाथो हमने ज़िंदगी ठगी देखी है,
अमीरो के शौक ही जलाते है ग़रीबो के चूल्हे ,
इसी यक़ीन मे चौराहे पे एक औरत खड़ी देखी है,
लोगो को ख़ुश करना भले ही पेशा हो उसका ,
रात के अंधेरे मे उसकी आँखो मे नमी देखी है ,
दौलत और शौहरत के इस खेल मे"तन्हा",
ग़रीबी के क़दमो मे अमीरी पड़ी देखी है,

Monday, May 3, 2010

कमल   था  अपनी    खुशबू  लुटता   चला   गया,
दरिया के साथ किया इश्क उसे निभाता चला गया, 
मोहब्बत   में    मंजिल   की    परवाह   किसे  है,
मैं  बहता चला    गया  वो  बहाता    चला    गया I